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वन्दे मातरम् — 150वीं वर्षगांठ: इतिहास, महत्व और समकालीन प्रासंगिकता

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न्यू दिल्ली – वन्दे मातरम् — यह दो शब्द भारत के राष्ट्रीय चेतना में गहरे उतर चुके हैं। 7 नवंबर 1875 को बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह रचना आज 150 साल की हो चुकी है। इस वर्षगांठ का मतलब सिर्फ एक तिथिगत उत्सव नहीं है; यह उस निरंतर बहस और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है जो वर्षों से देश के सार्वजनिक‑जीवन में व्याप्त है। इस लेख में हम वन्दे मातरम् के इतिहास, स्वतंत्रता‑संग्राम में इसकी भूमिका, समकालीन विवाद, सरकार‑स्तरीय आयोजन और भविष्य के लिए इसका क्या अर्थ हो सकता है — इन सभी पक्षों का विस्तार से संकलन कर रहे हैं।

इतिहास: रचना से राष्ट्रगीत तक

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी महाकाव्यात्मक उपन्यास आनन्दमठ (Anandamath) में वन्दे मातरम् की रचना रखी थी। उपन्यास के सन्दर्भ में यह गीत साठ-हत्तर के दशक के सामाजिक‑राजनीतिक परिदृश्य से जुड़ा हुआ था; यह एक तरह का आत्मिक आवाहन था — मातृभूमि को नमन और देश के लिए समर्पण। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत बार-बार बड़े‑से‑बड़े सभाओं में गूँजा और क्रांतिकारियों के लिए एक प्रेरक गान बन गया। 24 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान सभा ने ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत के रूप में मान्यता दी — यह माना गया कि राष्ट्रगीत ‘जन गण मन’ सुबोध अधिकारिक है पर वन्दे मातरम् का ऐतिहासिक व भावात्मक स्थान अलग है।

सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व

वन्दे मातरम् ने भारतीय जनता में एकता‑भाव जगाने का काम किया। यह गीत भाषाई और प्रांतीय सीमाओं के पार जाकर भारतीयता की एक साझा भाषा बन गया। सामाजिक‑सांस्कृतिक कार्यक्रमों, स्वतंत्रता दिवस की सभाओं और विरोध‑आंदोलनों में इस गीत ने सदैव एक प्रेरक सार्थकता दी। यह गीत राष्ट्रीय‑भावना तक सीमित न रहकर स्कूलों‑कॉलेजों में, मंचों पर और सार्वजनिक आयोजनों में भी गाया गया — इस तरह यह सामूहिक स्मृति का एक आधार बन गया।

समकालीन बहस और विवाद

वन्दे मातरम् के प्रति कुछ समुदायों ने असहमति जताई है — कारण है गीत में प्रयुक्त कुछ शब्दों की धार्मिक या सांस्कृतिक व्याख्या। इस कारण कुछ जगहों पर इसके सार्वजनिक गायन को लेकर बहस हुई है। आधुनिक भारत में जहाँ बहुलता (plurality) और अधिकार‑अवशेष (individual rights) पर बल दिया जाता है, वहाँ किसी राष्ट्रीय प्रतीक के अनिवार्य उपयोग पर निरन्तर बहस होती रहती है: क्या इसे अपनाना स्वैच्छिक होना चाहिए, या राष्ट्र‑अनुष्ठान में यह अनिवार्य किया जाना चाहिए? यह प्रश्न वन्दे मातरम् के आधुनिक प्रासंगिकता को चुनौती देता है और साथ ही यह सोचने पर मजबूर करता है कि राष्ट्रीयता और सहिष्णुता के मध्य संतुलन किस प्रकार कायम रखा जाए।

“जब हम वन्दे मातरम् गाते हैं, तो हमें केवल शब्दों का उच्चारण नहीं करना चाहिए; हमें उस भाव‑प्रतिज्ञा को समझना चाहिए जो हर नागरिक को जोड़ती है — एक जिम्मेदारी, एक अनुशासन और एक आदर्श।”

सरकार और सामाजिक पहल — 150वीं वर्षगांठ के आयोजन

केंद्र और कई राज्य सरकारों ने वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर वर्षभर चलने वाले कार्यक्रमों की घोषणा की है। इन आयोजनों में सामूहिक गायन (mass singing), शैक्षिक संगोष्ठियाँ, प्रदर्शनी, स्टांप‑रेलीज़, स्मारक सिक्के और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल हैं। कुछ राज्यों में विशेष समितियाँ गठित की गई हैं ताकि जनता सहभागिता सुनिश्चित हो और आयोजन शांतिपूर्वक तथा सर्वसमावेशी ढंग से सम्पन्न हों। यह पहल राष्ट्र‑स्मृति को जागृत करने के उद्देश्य से है, परन्तु इसे राज्य‑नीति या सांस्कृतिक प्रभुत्व के रूप में नहीं, बल्कि सामूहिक इतिहास‑पठन के रूप में देखा जाना चाहिए।

युवा‑पीढ़ी और भविष्य की दिशा

युवा वर्ग से वन्दे मातरम् का भावनात्मक जुड़ाव इस वर्षगांठ की सफलता का निर्णायक पहलू होगा। स्कूली पाठ्यक्रम, कॉलेजों में बहस‑मंच और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर रचनात्मक अभियानों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि गीत का ऐतिहासिक सन्दर्भ, भाषाई व्याख्या और सार्वभौमिक संदेश युवा‑पीढ़ी तक पहुंचे। इसके साथ‑साथ यह भी आवश्यक है कि हम संवाद और संवादहीनता दोनों के संतुलन को न खोएं — विरोध और वैचारिक भिन्नता को रोका नहीं जा सकता, परन्तु उसे लोकतांत्रिक तरीके से संभाला जा सकता है।

वन्दे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ केवल एक उत्सव नहीं — यह आत्म‑परीक्षण का अवसर है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों का अर्थ समय‑समय पर परिवर्तित होता है, और हमें उन्हें ऐसे तरीके से संरक्षित करना चाहिए जो समाज के विविध समूहों का सम्मान करे। यदि हम इस गीत को केवल भक्ति‑संगीत के रूप में नहीं बल्कि एक निहित लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के रूप में लें, तो यह गीत आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रासंगिक रहेगा।

 

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