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श्रवण शाह: बेगूसराय के मोदी समर्थक जो 160 रैलियों में हनुमान बनकर पहुंचे

Shravan Shah: The Modi supporter from Begusarai who attended 160 rallies dressed as Hanuman
श्रवण शाह का यह उपक्रम केवल एक समर्थक की भागीदारी नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक समर्थन और धार्मिक प्रतीकवाद का संगम है। वे पारंपरिक केसरिया वेश में, अक्सर नंगे पांव, और हाथ में ‘NaMo BJP’ जैसे संदेश लिए हुए रैलियों में जाते हैं। उनका कहना है कि यह उनका विश्वास और समर्पण है।

क्या करते हैं श्रवण शाह?

  • उन्होंने अब तक करीब 160 रैलियों में हनुमान के रूप में भाग लिया है।
  • उनकी वेशभूषा में केसरिया रंग, हाथ में समर्थक संदेश और सिर पर कमल‑प्रतीक दिखता है।
  • वे बताते हैं कि वे अक्सर पैदल और नंगे पांव यात्रा करते हैं—यह उनकी श्रद्धा का प्रतीक है।
“मैं पूरे देश में पैदल चलता हूँ, नंगे पांव, उनके लिए।” — श्रवण शाह

उन्होंने क्या कहा?

श्रवण शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में विकास के कई काम किए हैं, विशेष रूप से महिलाओं और गरीबों के लिए योजनाएँ लागू की हैं। वे मानते हैं कि मोदी की नीतियों ने आम आदमी के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। साथ ही उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राज्य नेतृत्व (जैसे मुख्यमंत्री) ने भी विकास में योगदान दिया है।

राजनीतिक‑सांस्कृतिक दृष्टि

श्रवण शाह की गतिविधियाँ दर्शाती हैं कि राजनीति और संस्कृति किस तरह एक दूसरे के साथ जुड़ते जा रहे हैं। कुछ मुख्य बिंदु:

  • भक्ति और राजनीति का संगम: हनुमान का वेश श्रद्धा का प्रतीक होने के साथ‑साथ राजनीतिक समर्थन की पहचान भी बन गया है।
  • दृश्यात्मक प्रभाव: रैलियों में इस तरह के अनूठे दृश्य लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं और सोशल मीडिया में तेजी से फैलते हैं।
  • मत‑प्रभाव: यद्यपि सीधे तौर पर मापक नहीं, ये दृश्य श्रीवृत्तियाँ रैली के माहौल को प्रभावित कर सकती हैं और मतदाताओं पर भावनात्मक प्रभाव डाल सकती हैं।

आलोचनात्मक दृष्टि

इस विषय पर कुछ आलोचनाएँ और चिंताएँ भी उठती हैं:

  • धार्मिक प्रतीक का राजनीतिक उपयोग: धार्मिक प्रतीकों का चुनावी संदर्भ में प्रयोग संवेदनशील मुद्दा बन सकता है।
  • वास्तविक नीति‑चर्चा का सन्निकटन: भारी प्रतीकवाद कभी‑कभी नीति‑आधारित चर्चा और तथ्यात्मक विमर्श को पीछे छोड़ देता है।
  • पारदर्शिता और संसाधन: यह प्रश्न भी उठता है कि इतनी यात्राएँ कैसे वित्तीय और संगठनात्मक रूप से संभव हुईं—क्या यह स्वयं का प्रयास है या किसी समूह/फंडिंग का समर्थन मिला है।

श्रवण शाह की कहानी राजनीतिक दृश्यावलियों में प्रतीकवाद की बढ़ती महत्ता को दर्शाती है। जब समर्थक इस तरह के नाटकीय और धार्मिक प्रतीक बनाते हैं, तो वे न केवल ध्यान खींचते हैं बल्कि चुनावी संवाद में एक नया आयाम जोड़ते हैं। ऐसे प्रदर्शन भावनात्मक जुड़ाव पैदा करते हैं, पर सवाल यह भी है कि क्या ये विवेचनात्मक बहस और नीति‑आधारिक चर्चा को नुकसान पहुंचाते हैं।

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