कांग्रेस का तर्क
कांग्रेस नेताओं ने प्रश्न उठाया है कि यदि वन्दे मातरम् को राष्ट्र‑भाव का अनिवार्य प्रतीक माना जाता है, तो फिर उन संस्थानों में जहाँ राष्ट्रीय कार्यप्रणाली की मिसाल दी जानी चाहिए, उसे क्यों नहीं अपनाया जाता। विपक्ष का कहना है कि यह केवल गायन का मामला नहीं है, बल्कि प्रतीक‑समर्पण और सार्वजनिक प्रतिबद्धता का सवाल है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से यह भी संकेत दिया कि इस व्यवहार से देश के प्रतीक‑मूल्यों के प्रति गंभीरता पर संदेह होता है।
आरएसएस‑बीजेपी की ओर से प्रतिक्रिया
वर्तमान समय में, आरएसएस और बीजेपी की ओर से इस आरोप पर कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। परंपरागत रूप से, दोनों संगठनों ने अपने‑अपने तरीके से राष्ट्र‑सम्बन्धी आदर्शों और कार्यक्रमों में भागीदारी दिखाई है—हालाँकि उनका सांस्कृतिक और संस्थागत स्वरूप कांग्रेस जैसे अन्य दलों से अलग रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ
यह विवाद सिर्फ गीतों के गायन तक सीमित नहीं है; यह राजनीतिक संस्थाओं के आचरण, प्रतीकात्मक कार्यप्रणाली और सार्वजनिक छवि से जुड़ा हुआ है। कुछ विश्लेषक बताते हैं कि राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों में प्रतीक‑कृत्यों का पालन करने का अर्थ यह है कि वे सार्वजनिक रूप से उन मूल्यों को मान्य करते हैं। वहीं अन्य का तर्क है कि प्रतीकात्मक आदतें संगठनात्मक स्वतंत्रता के दायरे में आती हैं और उनसे सीधे ‘देशभक्ति’ या ‘गैर‑देशभक्ति’ का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
“राष्ट्र‑गीतों का महत्त्व सांस्कृतिक होता है — वे भाव जगाते हैं। पर यह भी जरूरी है कि इस तरह के सवालों का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाए, न कि केवल राजनीतिक आरोप‑प्रत्यारोप में खो जाए।”
कौन‑कौन से प्रश्न उठते हैं?
- क्या किसी संगठन के कार्यालयों में राष्ट्रीय गीत का नियमित गायन अनिवार्य होना चाहिए?
- क्या प्रतीक‑कृत्य संगठन की नीयत को दर्शाते हैं, या यह केवल एक रस्म बनकर रह जाता है?
- क्या राजनीतिक आरोपों के बजाय इस मसले पर खुले संवाद की आवश्यकता नहीं है?
यह विषय आगे भी राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहेगा, खासकर तब जब राष्ट्र‑प्रतीक और सार्वजनिक व्यवहार जुड़ी चिंताएँ चुनाव‑प्रसंग तथा समाज‑राजनीति से प्रभावित हों।

